हमारे मन में कभी न कभी यह खयाल ज़रूर आया होगा कि देश में इतनी गरीबी क्यों है? सरकार के पास तो नोट बनाने की मशीन है। तो बहुत सारा पैसा छापकर देश से गरीबी को क्यों नहीं दूर करते? सरकार हर आदमी को तो करोड़पति बना सकती है। यह आइडिया सुनने में बहुत अच्छा लगता है कि आपके पास करोड़ रुपये होंगे और देश में कोई गरीब नहीं रहेगा।

लेकिन इकोनॉमिक्स की दुनिया में यह जो नोट ज़्यादा बनाने का फैसला है, इससे देश अमीर नहीं बनता बल्कि देश पूरी तरह से और ज़्यादा बर्बाद हो सकता है। आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं।
जो नोट आपके पास है, जिसके लिए हर कोई मेहनत करता है, असल में उसकी कोई वैल्यू ही नहीं है, ये सिर्फ कागज़ के टुकड़े हैं। उस कागज़ के टुकड़े की वैल्यू तब होती है, जब उसके बदले मार्केट में सामान उपलब्ध होता है।

पैसा सिर्फ एक माध्यम है सामान खरीदने के लिए। असली दौलत तो देश में पैदा होने वाले सामान जैसे अनाज, फल, देश में बनने वाली हर चीज़ और हर इंसान जो अपनी सेवा दे रहा है। अगर देश में सामान उतना ही रहेगा और पैसा ज़्यादा छाप देगा, तो पैसे की कीमत कम हो जाएगी।
मान लीजिए सरकार ने देश के हर आदमी को ₹1-1 करोड़ रुपये दे दिए। आप सुबह-सुबह मार्केट चले गए दूध लेने। जैसे ही आप दुकान पर पहुँचे, आपको पता चला कि दूध वाला आया नहीं। फिर आपको पता चलता है कि मार्केट में कोई भी सब्ज़ी बेचने वाला, काम करने वाला कोई नहीं आया है, क्योंकि सब लोग करोड़पति बन गए हैं। कोई काम नहीं करेगा, सब लोग आराम से ज़िन्दगी जिएंगे, सब लोग करोड़पति हैं।
जब कोई काम ही नहीं करेगा, मार्केट में सामान नहीं आएगा।

चलो, कोई दुकानदार अपनी दुकान खोल भी लिया, तो उस पर जो सामान होगा उसका रेट बहुत ज़्यादा हो जाएगा। कैसे होगा? चलिए समझते हैं।
मान लो आपको एक बोरी चावल चाहिए। आप चावल लेने के लिए दुकान पर गए, लेकिन दुकानदार के पास सिर्फ 4 बोरी ही है और खरीदने के लिए बाहर 100 करोड़पति खड़े हैं। दुकानदार पहले के रेट में नहीं बेचेगा। दुकानदार कहेगा जो मुझे एक बोरी के ₹10 लाख देगा, चावल उसी को बेचूंगा। क्योंकि सबके पास करोड़ रुपये हैं, लोग ₹10 लाख भी देने के लिए तैयार हो जाएंगे।
पैसा बढ़ गया लेकिन सामान नहीं बढ़ा, बल्कि महंगाई बढ़ गई। इसी को इकोनॉमिक्स में हाइपरइन्फ्लेशन यानी अत्यधिक महंगाई कहते हैं।
इतिहास में ऐसी घटना हो चुकी है। कुछ देश नोट ज़्यादा छाप दिए और इसके बेहद खतरनाक परिणाम भुगते हैं।
जिम्बाब्वे सरकार ने 2008 में अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए भारी मात्रा में नोट छाप दिए। उसके बाद वहाँ की महंगाई बहुत गुना बढ़ गई। लोग सिर्फ चाय पीने के लिए बोरी भरकर पैसा लेकर जाने लगे। हालत इतनी खराब हो गई कि सरकार को 100 ट्रिलियन डॉलर ($100,000,000,000,000) का एक सिंगल नोट छापना पड़ा,

जिसकी कीमत बाद में कुछ रुपयों के बराबर भी नहीं बची।
कुछ साल पहले वेनेजुएला ने भी अपने नोट बहुत छाप दिए थे। नतीजा यह हुआ कि वहाँ पैसों की वैल्यू इतनी गिर गई कि लोगों ने पैसे कचरे के डिब्बे में फेंकना शुरू किया। वहाँ के लोग पैसों को गिनते नहीं थे, वहाँ तौलते थे;

एक किलो पैसे के बदले एक किलो आलू मिलता था।
किसी भी देश की अमीरी इस बात पर निर्धारण नहीं करती है कि उस देश की तिजोरी में कितना पैसा है। देश की अमीरी उस बात पर निर्भर करती है कि उस देश में कितना उत्पादन हो रहा है।
जब देश में नए नए फैक्ट्री खुलते हैं, खेती-बाड़ी बढ़िया होती है,

नई टेक्नोलॉजी आने लगती है, लोगों को रोज़गार मिलता है, तब देश अमीर बनता है। इसलिए सरकार उतना ही पैसा छापती है जितना देश की अर्थव्यवस्था और उत्पादन की क्षमता होती है।
पैसा छापने से गरीबी नहीं मिटती, बल्कि पैसा अपनी कीमत खो देता है।
